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Pulwama Attack: काफिले में शामिल CRPF के जवान की जुबानी हमले का आंखों-देखा हाल

Pulwama Attack: काफिले में शामिल CRPF के जवान की जुबानी हमले का आंखों-देखा हाल

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(इस लेख में पुलवामा अटैक के चश्मदीद गवाह CRPF की 43वीं बटालियन में शामिल 28 साल के जवान जोदूराम दास का कंगन आचार्य से साझा किया गया आंखों-देखा हाल है.)

जम्मू के सीआरपीएफ ट्रांजिट कैंप से श्रीनगर के लिए हमारा सफर तड़के तीन बजे शुरू हुआ. हमारे काफिले में करीब 40 बसें थीं. एक कतार में हम आगे बढ़ रहे थे. हमारा काफिला बिना कहीं रुके करीब 12 घंटे आगे बढ़ा. बीच में दो सीआरपीएफ कैंप पड़े, लेकिन हम नहीं रुके. बहुत ठंड थी और बर्फ पड़ रही थी. बर्फ की वजह से हम कैंप्स में अपनी गाड़ियां पार्क नहीं कर सकते थे.

12 घंटे की यात्रा के बाद दोपहर तीन बजे काजीगंज पहुंचे. हम यहां रुकना चाहते थे. लेकिन यहां भी जगह की कमी थी. अन्य बटालियन के सीआरपीएफ जवानों से कैंप भरा हुआ था. हमारे पास आगे बढ़ने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था. वो भी बगैर कुछ खाए. शाम पांच बजे के करीब हम पुलवामा पहुंचे.

पुलवामा से करीब 200 मीटर ही आगे निकले थे, तभी हमारे काफिले की बस में उड़ गई और जोरदार धमाका हुआ. हमने हवा में उड़ती बस में बैठे सीआरपीएफ जवानों के शरीर टुकड़े-टुकड़े होकर हवा में उड़ते दिखे. इससे पहले कि हम कुछ समझ पाते, बस का मडगार्ड हमारी बस के शीशे पर आकर लगा और शीशा चूर-चूर हो गया. हम समझ गए थे कि यह आईईडी ब्लास्ट है. जब इस तरह का ब्लास्ट होता है तो सब टुकड़े-टुकड़े हो जाता है. सिर्फ बस का इंजन अपनी जगह पर टिका था. बाकी सभी हिस्से 50 से 60 फुट दूर जाकर गिरे. हमने इस तरह के आईईडी ब्लास्ट की बातों नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुनी थीं. लेकिन जम्मू-कश्मीर में कभी नहीं.

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धमाके के बाद दूसरे बसों ने काम करना बंद कर दिया

धमाका इतना जोरदार था कि जिस बस में हम थे, उसके इंजन ने भी काम करना बंद कर दिया. हम बस से उतरे. उतरते ही पाया कि दूर से फायरिंग हो रही है. हमारी बस में चार लोगों के पास हथियार थे. हमारी टीम ने बचाव के लिए तुरंत गोलियां चलाईं. चार या पांच राउंड फायरिंग के बाद आतंकी भाग गए. वो तीन या चार लोग थे. बस की छत पर सीआरपीएफ गार्ड संभावित पत्थरबाजी से बचाने के लिए बैठा था. वो गंभीर रूप से घायल हो गया.

जिस बस में ब्लास्ट हुआ, वो हमसे महज 15 मीटर आगे थी. हमारे गार्ड के पास बुलेटप्रूफ जैकेट के अलावा और कुछ नहीं था, जिससे उसके शरीर का कुछ हिस्सा ढका हुआ था. हमने उसे बस से उतारा. वह कुछ बोलना चाह रहा था, लेकिन नहीं बोल पाया. उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया.

हमारी बस को टो-अवे करने की जरूरत थी, क्योंकि इंजन स्टार्ट नहीं हो रहा था. बस की बॉडी को कोई खास नुकसान नहीं हुआ था. लेकिन इंजन बंद था. हमारे काफिले की तीन बसें इसी तरह बंद हो गई थीं. जिस बस में धमाका हुआ, वो काफिले में चौथे नंबर पर थी. हमें उस वक्त समझ नहीं आया कि हमला कैसे हुआ. शक था कि एक स्कॉर्पियो में बम था, जो बस से टकराई. यह फिदायीन हमला था. लेकिन सवाल अब भी था कि सड़क के किस तरफ स्कॉर्पियो खड़ी थी.

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आत्मघाती हमलावर की गाड़ी कहां से आई?

शक करने की बात यह थी कि पुलवामा से निकलने के दौरान हमें रास्ते में एक भी सिविलियन गाड़ी नहीं मिली. जम्मू-कश्मीर के बारे में जो भी जानता है, उसे पता है कि आतंकी सिविलियन गाड़ी पर हमला नहीं करते. सवाल यही है कि क्या वहां के लोगों को पहले ही चेतावनी दी गई थी कि गाड़ी न निकालें? इस बात की शंका है कि वहां काफी लोगों को इस हमले के बारे में जानकारी थी.

स्कॉर्पियो ने या तो ओवरटेक करते हुए बस को टक्कर मारी या फिर डिवाइडर के बीच जगह से निकलकर आई. ज्यादा उम्मीद इसी बात की है कि डिवाइडर के बीच जगह से गाड़ी निकलकर आई. डिवाइडर हमारे दाईं तरफ था. बस में ज्यादा नुकसान उसी तरफ हुआ.

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हमले के बाद हम नजदीक के सीआरपीएफ कैंप गए. वहां करीब दो घंटे रुके. शाम करीब सात बजे हम श्रीनगर के लिए रवाना हो गए. इस दौरान हम उस जगह से गुजरे जहां ब्लास्ट हुआ था. हमने देखा कि ब्लास्ट से सड़क पर गड्ढा हो गया है. हमें गिनती के लिए एक स्टेडियम ले जाया गया. वहां 90 से ज्यादा जवान नहीं मिले. हम अब बदला लेना चाहते हैं. उम्मीद है कि सरकार हमें अपने जवानों की शहादत का बदला लेने देगी.

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